ग्रंथसार
गृहस्थ के आंगन में रहते हुए भी मन की विरक्ति कैसे संभव है, यही इस मार्ग का मर्म है।
संन्यास उपनिषद् · पाठ 12
गृहस्थ और संन्यास: एक साथ जीना