ग्रंथसार
बाह्य त्याग और आंतरिक बोध के बीच झूलती चेतना जब समस्त सांसारिक बंधनों को छोड़कर एकान्त का मार्ग चुनती है, तब वास्तविक संन्यास का उदय होता है।
संन्यास उपनिषद् · पाठ 2
परिव्राजक और सनातन चुनाव