ग्रंथसार
चेतना की सारी परतों को भेदकर जब साधक उस अद्वैत स्थिति में विलीन होता है जहाँ न कोई कर्ता शेष रहता है और न कोई कर्म, वही तुरीयातीत अवस्था है।
संन्यास उपनिषद् · पाठ 4
तुरीयातीत अवधूत: परे की अवस्था