ग्रंथसार
अस्तित्व की सभी धारणाओं को विसर्जित कर शून्य में विलीन हो जाने की प्रक्रिया ही निर्वाण है।
संन्यास उपनिषद् · पाठ 6
निर्वाण उपनिषद: बुझने की कला