ग्रंथसार
त्याग की अग्नि में अहंकार को भस्म कर आत्मस्वरूप में स्थिर होने का मार्ग ही वास्तविक सन्यास है।
संन्यास उपनिषद् · पाठ 9
याज्ञवल्क्य उपनिषद: ऋषि का विवेक