ग्रंथसार
रुद्र और विष्णु की अद्वैत सत्ता का वह बिंदु, जहाँ ब्रह्मांड के संहारक और पालक एक ही चेतना के दो रूप बन जाते हैं।
शैव उपनिषद् · पाठ 5
रुद्रहृदय