ग्रंथसार
परम सत्ता के शक्ति स्वरूप का दर्शन, जहाँ स्वयं देवी ही चराचर जगत की आधारशिला और मुक्ति का एकमात्र मार्ग बनकर प्रकट होती हैं।
शाक्त उपनिषद् · पाठ 2
देवी उपनिषद