ग्रंथसार
दत्तात्रेय का वह स्वरूप जो सृष्टि के समस्त द्वैत को मिटाकर स्वयं परमात्मा के साक्षात अनुभव में विलीन हो जाता है।
वैष्णव उपनिषद् · पाठ 11
दत्तात्रेय उपनिषद्