ग्रंथसार
भगवान वासुदेव के स्वरूप और उनके गोपीचन्दन तिलक की महिमा को आत्मसात् करने का मार्ग ही यह उपनिषद् है।
वैष्णव उपनिषद् · पाठ 8
वासुदेव उपनिषद्