ग्रंथसार
योग केवल देह का अभ्यास नहीं, अपितु स्वयं को समस्त उपाधियों से मुक्त कर चेतन सत्ता में लीन होने की एक अनवरत यात्रा है।
योग उपनिषद् · पाठ 11
एक विद्यार्थी का सार-निष्कर्ष