ग्रंथसार
चित्त की चंचलता को त्यागकर परमात्मा के सूक्ष्म बिन्दु में विलीन होने की दिव्य यात्रा का नाम ही ध्यानबिन्दु है।
योग उपनिषद् · पाठ 8
ध्यानबिन्दु उपनिषद: एकाग्रता का मर्म