ग्रंथसार
ज्ञान की नींव जहाँ एक अपरिवर्तनीय सत्य है, वहीं उसका विस्तार समय के साथ बदलती धाराओं की तरह बहता है।
प्रमाण और शास्त्र · पाठ 10
श्रुति और स्मृति: मूल और उसका विस्तार