ग्रंथसार
सगुण साकार की उपासना श्रेष्ठ है या निराकार ब्रह्म की, इसी जिज्ञासा से भक्तियोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
भगवद्गीता · अध्याय 12
भक्तियोग