ग्रंथसार
मानवीय स्वभाव की दो ध्रुवीय दिशाओं — दैवी संपदा और आसुरी वृत्तियों — का स्पष्ट विभाजन ही इस अध्याय का मूल है।
भगवद्गीता · अध्याय 16
दैवासुरसम्पद्विभागयोग