ग्रंथसार
ज्ञान और कर्म के द्वंद्व में उलझे अर्जुन के संशय को मिटाते हुए श्रीकृष्ण उसे निस्वार्थ कर्म के उस महामार्ग पर ले जाते हैं, जहाँ कर्तव्य ही ईश्वर की सच्ची उपासना बन जाता है।
भगवद्गीता · अध्याय 3
कर्मयोग