ग्रंथसार
गुरुदेव, यदि सत्य केवल सुनने से प्राप्त हो जाता, तो संसार में अज्ञानी कोई शेष न रहता, फिर भी मेरा मन बार-बार भ्रम में क्यों पड़ जाता है?
अद्वैत वेदान्त · पाठ 14
श्रवण, मनन और निदिध्यासन