ग्रंथसार
हर बोली के लहजे में मिट्टी की एक अपनी गंध होती है जो किसी भी अनुवाद की पकड़ से परे है।
अंचल की लोक परंपरा · पाठ 52
भाषा के भीतर छिपी लोक-चेतना