ग्रंथसार
हमारी यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि यह उन आवाज़ों की शुरुआत है जो अब हमारे भीतर गूँजने लगी हैं।
अंचल की लोक परंपरा · पाठ 60
लोक धरोहर की अनंत यात्रा