ग्रंथसार
बचपन की उन गलियों को फिर से जीवंत करने का रास्ता, महंगी खिलौनों की दुकानों से होकर नहीं, बल्कि हमारे घरों की दहलीज से होकर जाता है।
बचपन के खेल · पाठ 59
लोक खेलों का पुनरुद्धार