ग्रंथसार
लोक-शैली की संपादकीय कथा, दादाजी का कमरा आज उन पुरानी कहानियों की गूँज के बिना बहुत सूना था।
दादी-नानी की कहानियाँ · पाठ 58
अनकही कहानियों का सन्नाटा