ग्रंथसार
रास्ते के किनारे खड़ा वह पत्थर, जो न थकता है और न ही कहीं जाता है, बस आने-जाने वालों की थकान को अपनी छाया में समेट लेता है।
दर्शनीय स्थल · पाठ 41
मील का पत्थर