ग्रंथसार
हमारी परंपराएं किताबों में नहीं, बल्कि माताओं की लोरी और दादाजी के किस्सों में रची-बसी हैं।
क्षेत्रीय देवी-देवता · पाठ 58
लोक-स्मृति की निरंतरता