ग्रंथसार
ग़ाज़ीपुर की बैसवारी लोकगायन परंपरा का पूरा दोहा (स्रोत में दो ही पंक्तियाँ मुद्रित) — दैनिक जीवन।
लोकगीत · पाठ 17
सोचा सोना