ग्रंथसार
ढोल की थाप में छिपे हैं हमारे उत्सवों के प्राण और उसे बनाने वाले के हाथों की लय।
लोक कला एवं शिल्प · पाठ 39
नगाड़ा और ढोल बनाने वाले का हुनर