ग्रंथसार
मुखौटा पहनते ही कलाकार वह नहीं रहता जो वह था, वह वह बन जाता है जिसे सदियों से कहानियों में सुना गया है।
लोक कला एवं शिल्प · पाठ 43
लोक नाट्य के मुखौटा निर्माता