ग्रंथसार
मंच पर सजते ही कलाकार का साधारण व्यक्तित्व किसी दिव्य कथा के नायक में बदल जाता है।
लोक कला एवं शिल्प · पाठ 44
नृत्य के लिए वेशभूषा और आभूषण