ग्रंथसार
गांव की मिट्टी जब ढोल की गूंज से कांपती है, तो ऐसा लगता है जैसे धरती खुद अपनी धड़कनें सुना रही हो।
लोक कला एवं शिल्प · पाठ 49
ढोल और नगाड़ों का समूह