ग्रंथसार
ज्ञान की धारा जब अपनी मूल भाषा से निकलकर जनभाषाओं में बहती है, तो वह हर घर के आंगन तक पहुंच जाती है।
नवजागरण · पाठ 4
भाषा और जीवंत संवाद