ग्रंथसार
घोर अपमान और श्राप के भय से काँपती द्रौपदी ने जब सब कुछ त्यागकर पुकारा, तो द्वारिकानाथ बिना एक पल की देरी किये चले आये।
अनसुनी कथाएँ · पाठ 140
जब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को दुर्वासा ऋषि के संकट से बचाया (विस्तार)