ग्रंथसार
एक निर्धन लकड़हारे ने एक धनी सेठ को सिखाया कि जीवन का सबसे बड़ा सुख धन में नहीं, बल्कि मन के संतोष में है।
अनसुनी कथाएँ · पाठ 230
एक साधारण लकड़हारे को जीवन के सबसे बड़े सुख का ज्ञान कैसे हुआ? (विस्तार)