ग्रंथसार
क्या ऐसा कुछ है जिसे जान लेने से, सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?
अनसुनी कथाएँ · पाठ 37
जब श्वेतकेतु को उनके पिता ने आत्मज्ञान का अर्थ समझाया (संक्षेप)