ग्रंथसार
गुरुदेव सूतजी के मुख से भीष्म पितामह की अडिग सत्यनिष्ठा की गाथा सुनकर शिष्य देवरात के मन में धर्म की परिभाषा स्पष्ट हो गई।
आदिपर्व · अध्याय 103
भीष्म की अडिग प्रतिज्ञा