ग्रंथसार
सूतजी की वाणी में आज उस घटना का रहस्य छिपा है, जिसने गुरु-शिष्य की मर्यादा और एक राजा के अहंकार के बीच की रेखा को सदा के लिए खींच दिया था।
आदिपर्व · अध्याय 139
द्रुपद-पराभव और गुरुदक्षिणा