ग्रंथसार
सूतजी के मुखारविंद से निश्रृत यह कथा उस अग्नि-संस्कार की है, जहाँ से धर्म-स्थापना के दो महापात्रों का प्राकट्य हुआ।
आदिपर्व · अध्याय 165
धृष्टद्युम्न और द्रौपदी का प्राकट्य