ग्रंथसार
सत्य और धर्म की मर्यादा में बंधे पांडवों के उस गुप्त वनवास काल की एक अद्भुत कथा है, जब एक पुरोहित ने उनके तेज को पहचान कर राजमहल का द्वार खोल दिया था।
आदिपर्व · अध्याय 188
पुरोहित और युधिष्ठिर का संवाद