ग्रंथसार
अधर्म के जब-जब बढ़ते चरण हैं, तब-तब धरा पर छिड़े महा-रण हैं।
आदिपर्व · अध्याय 201
दैत्यों का अत्याचार और त्राहि-त्राहि