ग्रंथसार
गुरुदेव सूतजी के मुख से उपजी यह कथा न केवल सौंदर्य की पराकाष्ठा है, अपितु अहंकार के विनाश का एक गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य भी है।
आदिपर्व · अध्याय 208
तिलोत्तमा की सृष्टि