ग्रंथसार
अहंकार और लोभ की अग्नि में जलकर जीव अपना स्वरूप कैसे खो बैठते हैं, यह जानने की जिज्ञासा हर जिज्ञासु के मन में होती है।
आदिपर्व · अध्याय 33
विभावसु और सुप्रतीक का वृत्तांत