ग्रंथसार
सूतजी की अमृतमयी वाणी से गरुड़ के उस अद्भुत पराक्रम की कथा आज भी रोम-रोम में उत्साह का संचार कर देती है।
आदिपर्व · अध्याय 35
बालखिल्यों का गमन और भोजन की तृप्ति