ग्रंथसार
सूतजी के मुख से निकली यह गाथा उस क्षण का बोध कराती है जब क्रोध ने एक ऋषि-पुत्र के विवेक को ही ढक लिया था।
आदिपर्व · अध्याय 39
शृंगी का राजा परीक्षित को शाप