ग्रंथसार
इतिहास की राख में दबे प्रतिशोध के अंगारे जब सुलगते हैं, तो वह केवल एक साम्राज्य की नहीं, बल्कि एक युग की नियति को बदल देते हैं।
आदिपर्व · अध्याय 48
सर्पसत्र का संकल्प