ग्रंथसार
सूतजी की अमृतमयी वाणी ने नैमिषारण्य के वातावरण में जैसे काल के चक्र को साक्षात खड़ा कर दिया, जहाँ नागों के विनाश का वह लोमहर्षक दृश्य जीवंत हो उठा।
आदिपर्व · अध्याय 53
सर्प-सत्र का आरंभ और सर्पों का संहार