ग्रंथसार
नर्मदा के तट पर जब संध्या की लाली फैली, तब मुनिवर सूतजी के मुख से भीष्म पितामह के अंतिम क्षणों की गाथा सुनकर शिष्य देवरात की आँखें भर आईं।
अनुशासनपर्व · अध्याय 145
भीष्म का महाप्रयाण