ग्रंथसार
दान केवल हाथ से दी गई वस्तु नहीं, बल्कि हृदय से बहती करुणा की वह धारा है जो देने वाले और लेने वाले दोनों को तृप्त कर देती है।
अनुशासनपर्व · अध्याय 27
दान की श्रेष्ठता