ग्रंथसार
दान का अर्थ केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, अपितु अहंकार के विसर्जन से स्वयं को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना है।
अनुशासनपर्व · अध्याय 3
दान का फल