ग्रंथसार
नदी के शीतल तट पर बैठे हुए सूतजी ने जब देवरात को जल और अतिथि के महत्व का रहस्य बताया, तो मानो स्वयं गंगा की धारा उनके मुख से बह निकली।
अनुशासनपर्व · अध्याय 30
जल और अतिथि-सत्कार की महिमा