ग्रंथसार
नदी के तट पर बैठी सूतजी की शीतल वाणी देवरात के हृदय में धर्म का एक नया प्रकाश जगा रही थी।
अनुशासनपर्व · अध्याय 93
गृह दान का माहात्म्य