ग्रंथसार
गुरुदेव, जब जीवन की संध्या ढल रही हो और चारों ओर विनाश का कोलाहल हो, तब एक ज्ञानी पुरुष किस प्रकार अपनी शांति को स्थिर रखता है?
आश्रमवासिकपर्व · अध्याय 10
दावानल की विकराल ज्वाला