ग्रंथसार
मृत्यु के शीतल सन्नाटे में जब धर्मराज जैसे ज्ञानी का धैर्य भी डोल जाए, तब जीवन की वास्तविकता का बोध ही एकमात्र सहारा होता है।
आश्रमवासिकपर्व · अध्याय 38
युधिष्ठिर का विलाप