ग्रंथसार
सूतजी महाराज की मधुर वाणी से निकली यह गाथा अर्जुन के उस परावर्तन की है, जहाँ युद्ध की रणभेरी के बाद भी उनका मन शांत सरोवर सा स्थिर हो गया था।
आश्वमेधिकपर्व · अध्याय 56
हस्तिनापुर की ओर प्रस्थान